यहां झंडा फहराने गए थे नीतीश, भाषण दिया, लौट गए, लालू आते थे तो पानी का टैंकर लाते और गंदगी में सने बच्चों को नहलाते थे

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  • Where CM Nitish Kumar Went To Unfurl The Flag Last Year, There Are Open Drains, There Is Dirt Everywhere, Electricity Bills Of Thousands Are Disturbed.

पटना36 मिनट पहलेलेखक: विकास कुमार

पसही फरीदपुर गांव से करीब 22 किलोमीटर दूर जाहिदपुर गांव में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 2018 में झंडा फहराने गए थे।

  • इसी गांव के मांझी टोले में हर तरफ गंदगी पसरी है, सुअर और इंसान के बच्चे नाले के आसपास घूम रहे हैं, नल-जल योजना के तहत लगे नल के और खुले नाले के बीच दस कदम से भी कम की दूरी है
  • टोले में एक मैदान है, जिसमें पिछले कई महीनों से कमर भर पानी जमा है, कई बीमारियों को जन्म देने वाला खुला नाला पटना के फुलवारी शरीफ ब्लॉक के पसही फरीदपुर गांव में है

सड़क किनारे बनी पुलिया पर कई लोग बैठे हुए हैं। दिन के तीन बज रहे हैं। जिस जगह पर ये लोग बैठे हैं, उसके ठीक बगल से एक खुला नाला बह रहा है, जिसके दोनों तरफ घर बने हैं। ढलुआ सड़क बनी है, जो आगे मांझी टोले और पासी टोले में जा रही है। सड़क के साथ ही बह रहा नाला भी उन टोलों तक जा रहा है।

इस पुलिया से थोड़ी दूर पर एक मैदान है, जिसमें पिछले कई महीनों से कमर भर पानी जमा है। पानी से लबालब भरा ये मैदान और कई बीमारियों को जन्म देने वाला खुला नाला पटना के फुलवारी शरीफ ब्लॉक के पसही फरीदपुर गांव में है।

इस गांव में पिछले साल 26 जनवरी को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ पूरा सरकारी अमला आया था। झंडोतोलन का कार्यक्रम हुआ था। गांव के विकास के लिए गई घोषणाएं हुई थीं। दस करोड़ रु की लागत से पसही से नकटी भवानी रोड, पंचायत भवन, सामुदायिक भवन, दो आंगनबाड़ी, अतिरिक्त स्वास्थ्य केंद्र, फरीदपुर उत्क्रमित मध्य विद्यालय को हाईस्कूल का दर्जा और पसही प्राथमिक विद्यालय को मिडिल स्कूल बनाने की घोषणा हुई थी।

गांव वालों का कहना है कि जो सामुदायिक भवन नया बना है, उसमें ताला लगा रहता है।

गांव वालों का कहना है कि जो सामुदायिक भवन नया बना है, उसमें ताला लगा रहता है।

गांव वालों का आरोप है कि घोषणाओं को पूरा तो किया गया लेकिन आधा-अधूरा। लाल बाबू राय कहते हैं, ‘पहले सामुदायिक भवन यहीं था। गांव के बीच में। गर्मी-बरसात में सबके काम आता था। अभी ही हम लोग नाले पर बैठे हुए हैं। पहले उसी में बैठते थे। नया जो बना है, वो यहां से पांच किलोमीटर दूर है। वहां कुत्ता भी नहीं जाता है। ताला लगा रहता है। पानी की टंकी नहीं लगा। पानी सीधे मोटर से आता है।’

वहीं 35 साल के वीरेंद्र कुमार का मानना है कि मुख्यमंत्री के आने से गांव में बहुत विकास हुआ। वो बताते हैं, ‘पूरे गांव में पक्की सड़क है। आप खुद देख लीजिए। स्कूल है। यहां से कुछ किलोमीटर की दूरी पर सौ बेड का अस्पताल बन रहा है। घर-घर बिजली है। पानी है। ये सब उनके आने के बाद ही हुआ है। पहले यहां कुछ नहीं था।

जब हम वीरेंद्र से पूछते हैं कि गांव के बीच से बह रहा इतना बड़ा नाला कैसे खुला रह गया? इस सवाल के जवाब में वो बताते हैं, ‘ऊ आए तो किसी से मिले-बतियाए थोड़े थे। आए। झंडा फहराए। भाषण दिए और चले गए। हमसे पूछते तो सबसे पहले इसी के बारे में कहते। ई बीमारी का खान है। काहे खुला है? ई त आप उन्हीं से पूछिए। अधिकारियों से पूछिए। हम क्या ही बताएं!’

सत्ता में आने के बाद से हर साल गणतंत्र दिवस के मौके पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पटना के पास स्थित एक महादलित टोले में जाते हैं। वहां कुछ घंटे बिताते हैं। झंडोतोलन करते हैं। घोषणाएं करते हैं। जानकार मानते हैं कि वो ऐसा करके लालू यादव को फॉलो करते हैं।

बिजली बिल को दिखाते हुए बदरी माझी कहते हैं, 'एक पंखा चलाते हैं और एक बल्ब जलाते हैं। बिजली का बिल इतना ज्यादा हो गया है कि समझ नहीं आ रहा कि चुकाएं कैसे।'

बिजली बिल को दिखाते हुए बदरी माझी कहते हैं, ‘एक पंखा चलाते हैं और एक बल्ब जलाते हैं। बिजली का बिल इतना ज्यादा हो गया है कि समझ नहीं आ रहा कि चुकाएं कैसे।’

जब लालू यादव राज्य के मुख्यमंत्री थे तो उनके काफिले के साथ एक पानी का टैंकर चलता था। मुख्यमंत्री का काफिला रास्ते में आने वाले किसी भी महादलित बस्ती के बाहर रुक जाता। खुद मुख्यमंत्री गंदगी में खेल रहे बच्चों को नहलाते। उनका बाल बनाते। साफ कपड़े पहनाते और पढ़ाई-लिखाई करने के लिए कहते थे। ये विडम्बना ही है कि महादलितों की स्थिति ना लालू यादव के नहलाने से बदली और ना ही नीतीश कुमार द्वारा झंडा फहराने से।

इसी गांव के मांझी टोले में हर तरफ गंदगी फैली हुई है। सुअर और इंसान के बच्चे नाले के आसपास घूम रहे हैं। नल-जल योजना के तहत लगाए गए नलके और खुले नाले के बीच दस कदम से भी कम की दूरी है। तारा देवी टोले की दूसरी महिलाओं के साथ मिलीं। इनकी असल परेशानी गंदगी नहीं है। वो कहती हैं, ‘हम तो सालों से इस नाले के साथ रह रहे हैं। क्या करें? आप तो सरकार से कहकर राशन दिलवाइए। पूरे लॉकडाउन में नहीं मिला। काम-धंधा है नहीं। बच्चों को पालने में बड़ी दिक्कत हो रही है।’

अभी तारा ने अपनी बात खत्म ही की थी कि छठी क्लास में पढ़ने वाली गीता बोल उठी, ‘मेरी दादी को भी राशन नहीं मिल रहा है। बिजली का बिल भी बहुत आता है। चार महीने में दो हजार का बिल आया है। हम तो दो पंखा और दो बल्ब ही जलाते हैं।’

गीता जिस मजबूती से अपनी बात रखती है, उससे पता नहीं चलता लेकिन पांच दिन पहले ही उनके बीमार पिता की मौत हो गई है। मां कई साल पहले ही गुजर चुकी है। पिता की बीमारी की वजह से ही बिजली का बिल जमा करने में देरी हुई और अब बिल इतना ज़्यादा हो चुका है कि उसकी बूढ़ी दादी चुकाने में असमर्थ हैं।

सौ से डेढ़ सौ वाले इस महादलित गांव में तेजी से बढ़ते बिजली बिल की वजह से कई परिवार परेशान हैं। एक प्रमुख शिकायत ये भी है कि इंदिरा आवास योजना के तहत पूरा पैसा नहीं मिला और इसी वजह से छत नहीं ढला पाया। करकट रखना पड़ा।

इसी तरह से तैयार हुए अपने दो कमरे के मकान और 1675 रुपए के बिजली बिल को दिखाते हुए बदरी माझी कहते हैं, ‘घर आपके सामने है। देख लीजिए। एक पंखा चलाते हैं और एक बल्ब जलाते हैं। बिजली का बिल इतना ज़्यादा हो गया है कि समझ नहीं आ रहा कि चुकाएं कैसे। बिजली बिल वसूलने के लिए आ जाते हैं। धमकाते भी हैं। गरीब आदमी कमाएगा नहीं तो बिल कहां से भरेगा?’

जहां पानी पीने के लिए नल लगा है वहां गंदगी पसरी हुई है।

जहां पानी पीने के लिए नल लगा है वहां गंदगी पसरी हुई है।

वहीं पसही फरीदपुर गांव से करीब 22 किलोमीटर दूर, पुनपुन नदी के किनारे बसे जाहिदपुर गांव में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का काफिला 26 जनवरी 2018 को पहुंचा था। जाहिदपुर भी एक महादलित बहुल गांव है। तब गांव के हाई स्कूल ग्राउंड में झंडोतोलन का कार्यक्रम हुआ था।

इस मैदान के पास ही रविदास मंदिर है। मंदिर के ठीक बगल में सामुदायिक भवन बन रहा है। नदी के किनारे पक्का घाट बन रहा है। गांव के मुहाने पर 1936 में स्थापित उच्च माध्यमिक स्कूल की इमारत चमक रही है। छत पर सोलर पैनल लगा है। स्कूल के बगल में अनुसूचित जाति के बच्चों के लिए आवासीय होस्टल बना है।

रविदास मंदिर के अहाते में बैठे राम प्रवेश कुमार सिंह को अपने गांव और गांव में हो रहे विकास कार्यों पर गर्व है। वो कहते हैं, “ई गांव कहने भर के लिए है। किसी भी शहर से अच्छा है। सब कुछ है यहां। नीतीश कुमार ने गांव की तस्वीर ही बदल दी।”

लेकिन, जिस बदली हुई तस्वीर का जिक्र राम प्रवेश कर रहे हैं वो गांव के अंदर दाखिल होने पर बदल जाती है। नाले खुले हुए हैं और बजबजा रहे हैं। गंदगी हर तरफ पसरी हुई है। गांव में एक बड़ा सा गड्ढा है, जिसमें पानी जमा है।

कमल चौधरी इसी गांव के रहने वाले हैं। अभी कुछ महीने पहले ही सर्कल ऑफिसर के पद से रिटायर हुए हैं। वो इस बारे में कहते हैं, ‘नालियां खुली हैं और गड्ढों में पानी जमा है इसके लिए अधिकारी ज़िम्मेदार हैं। वो आधा-अधूरा काम करते हैं।’

ये स्थिति उन दो गांवों की है, जहां खुद बिहार के मुख्यमंत्री आए थे। ये वो दो गांव हैं, जो राजधानी पटना से केवल 50-60 किलोमीटर की दूरी पर आबाद हैं। ऐस में सवाल उठता है कि राज्य के उन 45,103 गांवों में कितना और कैसा विकास पहुंचा होगा जो दूर-दराज के इलाकों में फैले हुए हैं और जहां बड़ी आबादी रहती है।

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