बॉम्बे हाईकोर्ट ने पूछा- क्या जांच एजेंसी को सलाह देना मीडिया का काम है कि उसे जांच कैसे करनी चाहिए?

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मुंबई5 घंटे पहले

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सुशांत सिंह राजपूत मौत मामले की जांच सीबीआई की टीम कर रही है। -फाइल फोटो

  • पूर्व पुलिस अधिकारियों ने सुशांत केस में मीडिया ट्रायल को लेकर पीआईएल दायर की
  • पुलिस का आरोप है कि इस केस में मीडिया द्वारा मुंबई पुलिस को बदनाम किया जा रहा था

बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार को पूछा कि क्या जांच एजेंसी को सलाह देना मीडिया का काम है कि उसे जांच कैसे करनी चाहिए? अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत मामले में मीडिया ट्रायल के खिलाफ पीआईएल दायर की गई है। इसी की सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस जी एस कुलकर्णी की बेंच ने यह सवाल पूछा।

कोर्ट ने कहा- यह जांच अधिकारी का काम है कि वह जांच करते समय अपना दिमाग लगाए। जजों ने यह टिप्पणी तब की, जब मालविका त्रिवेदी एक न्यूज चैनल की ओर से अपना जवाब दे रही थीं। उन्होंने जनहित याचिकाओं का विरोध किया था।

त्रिवेदी ने सीनियर वकील अस्पी चिनॉय द्वारा दी गई दलीलों का विरोध किया। पूर्व पुलिस अधिकारियों के एक समूह की ओर से एक सुशांत केस में मीडिया ट्रायल को लेकर पीआईएल दायर की गई है। पुलिस अधिकारियों का आरोप है कि इस केस में मीडिया दवारा मुंबई पुलिस को बदनाम किया जा रहा था।

त्रिवेदी ने कहा- रिपोर्टिंग को लेकर कोई भी झूठा आदेश नहीं दिया जा सकता है। मीडिया की भूमिका पर कैसे सवाल उठाया जा सकता है। उन्होंने पूछा- हाथरस मामले के बारे में क्या? क्या इस मामले में मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण नहीं है?

जिम्मेदार पत्रकारिता पर सवाल

कोर्ट ने कहा कि जनहित याचिकाएं किसी आदेश के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि यह केवल जिम्मेदार पत्रकारिता को लेकर है। बेंच ने कहा- चिनॉय का कहना है कि मीडिया जांच में हस्तक्षेप नहीं कर सकता है या यह घोषित नहीं कर सकता कि कौन दोषी है, कौन नहीं है।

न्यूज चैनल किसी के अपराध को पूर्व-निर्धारित नहीं कर सकते

वकील चिनॉय ने तर्क दिया कि प्रेस, खासतौर से न्यूज चैनल, किसी के अपराध को पूर्व-निर्धारित नहीं कर सकते हैं। और राजपूत मामले में रिया चक्रवर्ती की गिरफ्तारी के लिए समाचार चैनल द्वारा `हैशटैग’ अभियान चलाया गया। “क्या आप सोच सकते हैं कि इस तरह के हैशटैग से नुकसान हो सकता है? अपराध पर फैसला लेने या गिरफ्तारी का सुझाव देना किसी न्यूज चैनल का काम नहीं है।

हाईकोर्ट ने पूछा कि क्या न्यूज ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी (एनबीएसए) ने न्यूज चैनलों के खिलाफ मिले शिकायतों पर कोई आदेश जारी किया है। एनबीएसए की वकील एडवोकेट निशा भंभानी ने कहा कि ज्यादातर शिकायतें सुनी गईं और चैनलों से माफी मांगने के लिए कही गई।

केंद्र सरकार से सोमवार को जवाब मांगा

कोर्ट ने पूछा- क्या माफी मांगना पर्याप्त है। इस पर भंभानी ने कहा कि एनबीएसए जरूरी होने पर गाइडलाइनन भी सबमिट करेगा। लेकिन एक अन्य याचिकाकर्ता के वकील राजेश इनामदार ने कहा कि इनमें से ज्यादातर न्यूज चैनल एनबीएसए के सदस्य नहीं थे। कोर्ट ने इस मामले में सोमवार को केंद्र सरकार से जवाब मांगा है।

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